Friday, 12 August 2016

Ghazal

दुनिया को मासूम न समझो मेरे दोस्त !
लुटा कर तुम्हें, तेरे गम के  मंजर  ढूंढते  है I

सलीके से टटोलकर तेरी कमजोरियों को
सीने में उतारने को खंजर ढूंढते  है 

अहसास  नहीं उनको जला तेरा आशियां
तुम्हें आंसू बहाते देखने की, नज़र ढूंढते है  

गिरा कर तुम्हारी  उम्मीदों की दीवारों को
अपनी ही जीत का हुनर ढूंढते  है I

उजाड़ कर अरमानों की बस्ती को
अपने लिए सायेदार शजर ढूंढते है I

दुनिया को मासूम न समझो मेरे दोस्त
लुटा कर तुम्हें, तेरे गम के  मंजर  ढूंढते  है I


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