खून के,दर्द के,प्यार के रिश्ते,
माँग रहे है पनाह
दिलों में तुम्हारे,दिलों में हमारे
ये टूटते-बिखरते
नजदीक और नाज़ुक- से रिश्ते,
ढूँढ रहे है थोड़ी-सी जगह
घरों में, परिवारों में
आदर्शों में, विचारों में
नन्हे-नन्हे हाथों पर थमी
सतरंगी मोतियों-जैसी
हंसती हुई ओस की बूंदों जैसे ये रिश्ते,
माँग रहे है शीतल छांह
इन्हें आग में मत झोंको
सिमट जाएंगें, मिट जाएंगे
और लिखेंगें रिश्तों की एक नई परिभाषा
जिसमें शब्द होंगे –
स्वार्थ के, छल के, कपट के
प्रपंच के,मलिनता के
याद रखो जो भी इस
शब्द जाल में जीता है,
नित्य हलाहल पीता है
सागर की भांति
पवन को आने दो,
सोख लेने दो अपने
प्रेम रूपी जल को
फिर बादलों की भांति बरसो
दसों दिशाओं में इतना बरसों
कि धरती से नवांकुर फूटें
हँसते-खिलखिलाते
और नवजीवन देंगे
मुरझाए रिश्तों को
पनपने दो रिश्तों को
मुस्कुराने दो
इन सुंदर –सजीले
पावन-पवित्र रिश्तों को
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