Wednesday, 17 August 2016

विश्वास

हर वर्ष श्रावण पूर्णिमा से पूर्व ही
तेरी हाथों से स्नेह-स्पर्श पाकर  
पहुँचती थी मेरे हाथों में राखी
मुझे पता है कि इस साल
नहीं आएगी तेरी राखी
चली गई हो तुम रूठकर
न जाने कहाँ ! न जाने किधर !
लेकिन मैं तुम्हें सपनों में देखता हूँ ,
और जब भी देखता हूँ ,
तुम्हें हँसते देखता हूँ ,
मुस्कुराते देखता हूँ,
खिलखिलाते देखता हूँ I

मुझे विश्वास है 

Rakhi

सावन के आते ही
बादलों के छा जाते ही
बहती स्नेह-धार है
उमड़ता ह्रदय में प्यार है I
मुस्कराती है राखियाँ
दुकानों में ,मेलों में I
दौडती है राखियाँ
यानों में रेलों में
लांघती हैं सीमाएँ
समुद्र के सीने को छूती
पहुँच जाती हैं ख़ुशी से
देशों से विदेशों तक
लेकर बहन का विश्वास
भाइयों के अहसासों तक I
बंधते हैं ये पावन धागे
प्रहरी से प्रधान  तक
व्यापारी से अधिकारी तक
निर्धन से धनवान तक I
खिलखिलाती है बहनें
भाइयों की कलाइयों पर
गर्वित हो उछलती है
मायके की उंचाईयों पर I
एक मुट्ठी प्यार के बदले
आंचल भर आशीष देती है  बहन I
धन्य है अखंड भारत
धन्य है ये पर्व और त्योहार
धन्य है रेशमी धागे में बंधा
भाई-बहन का अनंत प्यार I

रक्षा बंधन की हार्दिक शुभ कामनाएँ

Friday, 12 August 2016

Ghazal

दुनिया को मासूम न समझो मेरे दोस्त !
लुटा कर तुम्हें, तेरे गम के  मंजर  ढूंढते  है I

सलीके से टटोलकर तेरी कमजोरियों को
सीने में उतारने को खंजर ढूंढते  है 

अहसास  नहीं उनको जला तेरा आशियां
तुम्हें आंसू बहाते देखने की, नज़र ढूंढते है  

गिरा कर तुम्हारी  उम्मीदों की दीवारों को
अपनी ही जीत का हुनर ढूंढते  है I

उजाड़ कर अरमानों की बस्ती को
अपने लिए सायेदार शजर ढूंढते है I

दुनिया को मासूम न समझो मेरे दोस्त
लुटा कर तुम्हें, तेरे गम के  मंजर  ढूंढते  है I