Wednesday, 17 August 2016

विश्वास

हर वर्ष श्रावण पूर्णिमा से पूर्व ही
तेरी हाथों से स्नेह-स्पर्श पाकर  
पहुँचती थी मेरे हाथों में राखी
मुझे पता है कि इस साल
नहीं आएगी तेरी राखी
चली गई हो तुम रूठकर
न जाने कहाँ ! न जाने किधर !
लेकिन मैं तुम्हें सपनों में देखता हूँ ,
और जब भी देखता हूँ ,
तुम्हें हँसते देखता हूँ ,
मुस्कुराते देखता हूँ,
खिलखिलाते देखता हूँ I

मुझे विश्वास है 

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