पूज्य
मालिक की महासमाधि
डुबो गई थी दुःख के सागर में,
विषाद की उद्वेलित तरंगें
डुबो गई थी दुःख के सागर में,
विषाद की उद्वेलित तरंगें
उठ रही थी भावुक मन में
|
विचलित
हुई थी, शोकाकुल थी
अश्रुपूर्ण
आँखें व्याकुल थी
|
पर सहज मार्ग के ज्ञान- प्रकाश से
अंधकार छिन्न-भिन्न हुआ
|
मालिक
की उपस्थिति का आभास
मेरे
चारों
ओर तत्क्षण हुआ |
महातेज
में विलय उनका,दिव्य प्रकाश फैलाएगा
सम्पूर्ण
विश्व चिरकाल तक आलोकित रह जाएगा|
दसों दिशाओं में गूंजेंगें दिव्य
स्वर ,दिव्य निनाद
कण-कण जगमगाएगा , जगत दिव्यमय
हो
जाएगा
|
मेरे श्रद्धेय समर्थ गुरुदेव को
शत-शत प्रणाम ,शत-शत वंदन
|
No comments:
Post a Comment