Tuesday, 19 July 2016

शब्द-सुमन



पूज्य मालिक की महासमाधि

डुबो गई थी दुःख के सागर में,

विषाद की उद्वेलित तरंगें

उठ रही थी भावुक मन में |

विचलित हुई थी, शोकाकुल थी

अश्रुपूर्ण आँखें व्याकुल थी |

पर सहज मार्ग के ज्ञान- प्रकाश से

अंधकार  छिन्न-भिन्न हुआ |

मालिक की उपस्थिति का आभास

मेरे चारों ओर तत्क्षण हुआ |

महातेज में विलय उनका,दिव्य प्रकाश फैलाएगा

सम्पूर्ण विश्व चिरकाल तक आलोकित रह जाएगा|

दसों दिशाओं में गूंजेंगें  दिव्य स्वर ,दिव्य निनाद

कण-कण जगमगाएगा , जगत दिव्यमय हो जाएगा |

मेरे श्रद्धेय समर्थ गुरुदेव को

शत-शत प्रणाम ,शत-शत वंदन |

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