Saturday, 16 July 2016

याचना

सुबह की पहली निमाज़ के साथ

ऊपर की तरफ़ उठाकर अपने हाथ

मांगती हूँ खुदा से यह दुआ

मेरे मौला,मेरे मालिक –मुझे इन्सान बना दे |

दे दी है मुझे ज़िंदगी, हर चीज़ है मयस्सर

तेरे ही आंचल में जियूं ऐसा एक जहां बना दे |

इतनी बड़ी ज़मीन नापने की हिमाकत क्या करूँ !

बसेरा है तेरा जहाँ मुझे वह आसमां बना दे |

तेरी कायनात का एक छोटा सा ज़र्रा हूँ मैं

हर ज़र्रा खिल उठें ऐसा बागबां बना दे |

तलवार की धार पर चलकर ज़ख़्मी हुई हूँ चलकर

इशारा तेरी मंजिल का मिलें ऐसे निशान बना दें |

इस्मत और किस्मत लुटने की जहाँ कुछ डर ना हो

इस बस्ती में कहीं ऐसा बियाँबान बना दे |

रंजिश की तलवार से रंगती है रोज़ राहें

मुस्कुराते हो गुल जहाँ ऐसा गुलिस्तान बना दे |

नफ़रत और फ़ितरत छोड़ चल पड़े तेरी जानिब

ऐसे नेक दिलों का एक कारवां बना दे |

जिंदगी किसी के काम आए, हाथ ख़िदमत में उठे

मेरे मालिक ऐसे लम्हे बे इंतिहा बना दें

मेरे मालिक मुझे इन्सान बना दे |

मेरे मौला मुझे इन्सान बना दे ||

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